मिथिला में दीपावली के राइत सुप के संठी स किया पिटल जाइ छई ??

पुराण में वर्णित – समुद्र मंथन केर कथा में अन्य बहुमुल्य रत्न क संग जखैन लक्ष्मी निकललि तऽ हुनका संग हुनक बहिन दरिद्रा सेहो बहरैलि । सबटा मंथन सँ निकलल वस्तु योग्यता सनुसार बाँटल गेल ,
जेना -इन्द्र के ऐरावत ,उच्चैश्रवा नामक घोड़ा निकलल जे मनक गति सँ चलैत छल ,तेकरा दैत्य केँ राजा बलि राखि लेलनि ,
श्री हरि विष्णु के लक्ष्मी भेटलथिन किंतु दरिद्रा के सब लेवा सँ मना कऽ देल ।
लक्ष्मी बजलि जेतवा धरि हमर श्रेष्ठ बहिन के विवाह नै होयत ततबा काल हम विवाह नै करब ।
वड़ ताकए गेल आर दुसः मुनि सँ दरिद्राक विवाह भेल ।
दरिद्रा सासुर गेलि आर किछुए समयक बाद अपन अभद्र व्यवहार सँ दुसः मुनि केँ ततवा कष्ट देल जे क्रोधित भए मुनि दरिद्रा केँ श्राप दए देल आर कहलैनि जौउ – आहाँ जेतय असुद्धि, अभद्रता,तथा जुआ, मदिरा ,आ जोर-जोर सँ चिचिया के लोक बाजत ओतय आहाँक वास होएत ।
अपना सब औठाम सुखरातिक (दिपावली )राति में झाड़ु ,सूप सबहक पुजा हौइअछि |
जाँत ढ़ेकि ,उखड़ी-समाँट केवार ,खाट तथा जेतवा किछु गृहस्तिक उपयोग में आनल वस्तु रहैत अछि तेकरा में सिंदुर -पिठार लगैत अछि सबटा में लक्ष्मीक वास मानल गेल अछि ।
एहि राति में लक्षमी ओतय वास लैय छथि जेतय प्रकाश आर स्वच्छ रहैत अछी ।
दिपावलीक साँझ में उक फेरवाक नियम अछि ।
ऊक बनबै काल ओहिमें संठी खोंसल रहैत छैक ,ओकरा साँझ में फेरलाक बाद ऊक में सँ निकाली सूप उलटा कए गोसाँउनिक घर में राखल जाए अछि जाहि सँ अहलभोड़े सब मिथिलानी सूप संठी सँ पिटी दरिद्रा के बाहर भगबैत छथि ….।
कहबि छैक- “खाय लेल सुखराति ,
डेंगबैलेल खरसूप !!”

—रूबी झा

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