राजकमल चौधरी – कवी, लेखक, उपन्यासकार

महिषी  अपनभाग्य पर कुहरी रहल छल,!कारण छल मैथिली पुत्र  राजकमल  केर  चिर निद्रा में विश्राम । उग्रतारक आय रक्त पिपासा एतैक बढ़ि गेल,जे अपन नेना फुलबाबुक आहुति लए लेलन्हि ।एना कियाक,हिनका तऽ दसवें वर्ष में मायक ममतामयि आँचर माथ सँ छिनलेल गेल छल । मायक मृत्यु  प्रभाव हिनक बाल मन पर कठोर आघात केलक।

राजकमल चौधरीक जन्म उत्तरी बिहार में मुरलीगंज केर समीपवर्ती गाँव रामपुर हवेली में भेल छलैन्ह। हिनक वास्तविक नाम मणीन्द्र नारायण चौधरी छल किन्तु स्नेह सँ सब  फूलबाबू कहैत छलैन्हि

बचपन अपने पैतृक गाँव महिषी में बितल। बाद में अपन पिता मधुसूदन चौधरीक संग नवादा, बाढ़ आर जयनगर में किछुदिन रहबाक अबसर भेटलैंन्हि

 माताक मृत्युक उपरान्त हिनक पिता मधुसूदन चौधरी  जमुना देवी सँ पुनर्विवाह कऽ लेलन्हि। जमुना देवी, राजकमल कें हमवयस्क रहथि। घर में सत्तमायक आगमनक पश्चात  पिता सँ संबंध मधुर नहीं रहलैन्हि।  राजकमल कें एहि सामाजिक  कुरित पर अत्यधिक आक्रोश भेलैंन्हि ।जाहि कारणे  सन १९६७ में पिता के देहावसान के बाद राजकमल  अपन पिता केर मुखाग्नि नहीं दऽ सकला किंतु श्राद्धकर्म पूर्णरुपें केलैंन्हि।

जीवन उतार चढ़ाव बीच,शिक्षा-दिक्षा संग  वल जोड़ी गृहस्तधर्मक भार वहन करैत,भटकैत मन राजकमल कें,जीवनक यथार्थ मुल्यकप्रति सदत् जागरुक रहल ,  राजकमल मैथिली हिंदी,अंग्रेजी,बंगला  सब  भाषाक ज्ञाता छलाह ,तैं हेतु  किछु  ने किछु  सब भाषा मे हिनक रचना अछि।

जखैन  १९४८ में भागलपुर मारवारी कॉलेज में इंटरमीडिएट (वाणिज्य) में दाखिला लेलैन्हि,।।एहि क्रम में हिनक मित्रता ,नागदत्तक भागिन दिवानाथ सँ भेलैन्ह ,।ओहि समय तक हिनक कविताक प्रेमी पुरा मिथिलांचल भए गेल छल।

एकटा संयोगक चर्चा हम अपन पिता श्री भोलादत्त  झा  संस्मरण  सुनल जाए …। …ओहि समय अम्बिका बाबुक पिता यदुनाथ मिश्र  छलैन्हि  जिनकर नाम सँ यदुनाथ  पुस्तकालय अखनो तक लालगंज पैटघाट में अवस्थित अछि,ओतय  एकटा  काव्यगोष्ठी  भेल छल,ओहिमें अनेको ओहि समयक प्रमुख कवि वृंद उपस्थित छलाह ।जखैन कविता पाठ आरंभ तऽ ऱाजकमल अपन स्वरचित कविता पाठ आरंभ कैलैन्हि,स्थिति एहन छल जे श्रोता उठवाक लेल तैयारे नहिं। रातिक में काव्य गोष्ठी समापन के बाद ,नागदत्त ,हम राजकमल तीनहुँ विदा भेलहुँ ,रास्ता  में नागदत्त कहलैन्हि  चाचा राजकमल आप के साथ जाएगा और सुबह में मिलते हैं ।घरपर आबि जे किछु भोजन छलओहि में बाँटि हमरा सब ग्रहण कैल,।भोरे  नागदत्त अयलाक बाद हमरा सबके अवाम निवासी  -डाॅ वद्रीबाबु जे  अनेक भाषाक ज्ञाता आर साहित्यप्र प्रेमी छलाह हुनका लग प्रमोद कुमार सन्यालक पुस्तक आँका-बाँका,छलैंन्ह ,राजकमल के ई पुस्तक पढ़बाक छलैन्हि । जखनि सब ओतए पहुँचलहुँ तऽ साधारण  औपचारिकताक बाद,बद्रीबाबुक उत्तर छल जे पुस्तक भेटत ..किंतु काल्हि चारि बजे तक दय दी। पुस्तक केर  आकारक अनुसार ,समय कम छल ,किंतु राजकमल सहर्ष तैयार भए गेला ।दोसर दिन समयानुसार हम सब पुस्तक वापस करय लेल पहुँचल तऽ  बद्रीबाबु अनेको प्रश्न पुस्तक सँ पुछी देलथिन ,राजकमलक घ्रानशक्तिक देखि सब अचंभित छल। कहवाक प्रयोजन नहीं ,ई राजकमलक लेल साधारण गप्प छल ,किंतु हमरा लेल आयो ओ  छन अमुल्य अछि। राजकमल केर अतिंम  भेंट भेल जखनि हम वनैंली  कोठी पटना गेल रही।ओहिना तेज मुखमण्डल पर, जहिना हम अपन परिचय कहलियैन ओहिना बाजि उठला अरे !.. भोला हो  बैठो !, हम बैशि गेलहुँ सामने रैक पर महिंषीक भगवती उग्रतारा सामने विराजमान छलिह ।हमर आँखिक प्रश्न बिना पुछने ओ देलैन्हि ,ई हमर पुर्नजन्म क साक्ष छी ,हमर वर्तमान जीवन हिनके अनुकम्पा छी ।नहींतऽ हम ……..

रूबी झा

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